ट्रांसफार्मर क्या होता है | ट्रांसफार्मर की परिभाषा | ट्रांसफार्मर किस सिद्धांत पर कार्य करता है?

विषय सूची

What is a transformer? Transformer Kya Hai? Definition of transformer | On what principle does the transformer operate?

ट्रांसफार्मर की परिभाषा |Definition of Transformer in Hindi

जो यंत्र उसे दी गई फ्रीक्वेंसी और पावर में बदलाव किए बिना, वोल्टेज को कम या ज्यादा करके देता है। उस स्थिर यंत्र को ट्रांसफार्मर कहा जाता है। ट्रांसफार्मर के जरिये एक सर्किट की फ्रीक्वेंसी और पावर को वही फ्रीक्वेंसी और पावर कायम रखकर दूसरे सर्किट में स्थलांतरित (ट्रांसफर) किया जाता है।

हमे ट्रांसफार्मर की आवश्यकता क्यों होती है?

Why do We Need a Transformer?-In Hindi

सिंगल फेज सप्लाय सिस्टम से ज्यादा फायदे 3 Phase सप्लाई सिस्टम में होते हैं। इसलिए आजकल 3 Phase Supply System  का जनरेशन, ट्रांसमीशन और डिस्ट्रीब्यूशन किया जाता है। इस सप्लाय सिस्टम को अधिक कार्यक्षम बनाने के लिए भारतीय मानक संस्था ने हर एक पड़ाव के लिए एक मानक वोल्टेज निश्चित किया है। 

  • जनरेशन वोल्टेज (Generation Voltage) = 11 KV.
  • ट्रांसमीशन वोल्टेज ( Transmission Voltage) = 440 KV, 220 KV
  • डिस्ट्रीब्यूशन वोल्टेज (Distribution Voltage) = 132KV, 66KV, 33KV, 11KV
  • Utilization वोल्टेज (Utilization Voltage)= 440 V या 230 V

इस वोल्टेज मर्यादा को अगर ध्यान से समझे तो, 11000 वोल्ट जो जनरेट किया जाता है, और प्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों तक पहुंचने वाला वोल्टेज जो ग्राहक उपयोग में लाते है। वह होता है 3 Phase 440 वोल्ट और सिंगल फेज 230 वोल्ट.

इन सबसे हमे यह समझ आता है कि निर्माण किये गए 11000 वोल्ट को ही 440 वोल्ट और 230 वोल्ट तक कम किया जाता है।

इस प्रकार AC supply System में ज्यादा वोल्टेज को कम करते समय अथवा कम वोल्टेज को ज्यादा करते समय उसके सप्लाय फ्रीक्वेंसी और पावर में बदलाव नही होना चाहिए। इसके लिए जो यंत्र आवश्यक होता है वह होता है ट्रांसफार्मर।

ट्रांसफार्मर को स्थिर यंत्र क्यों कहा जाता है?

Transformer में कोई भी पार्ट मोटर की तरह घूमने वाला या आवाज करने वाला नही होता। इसलिए ट्रांसफार्मर को स्थिर यंत्र कहा जाता है।

ट्रांसफार्मर किस सिद्धांत पर काम करता है?

On What Principle Does the Transformer Work?- In Hindi

On What Principle Does the Transformer work?- In Hindi

ट्रांसफॉर्मर Electro Magnetic Induction के Self अथवा Mutual Induction तत्व के अनुसार काम करता है।

मतलब जब किसी बदलते चुम्बकीय क्षेत्र में कोई दूसरी कॉइल स्थिर रखी जाती है। तब वह बदलती चुम्बकीय रेखाएं स्थिर रखी कोईल के कंडक्टर की वजह से कट जाती हैं। और इस वजह से फेरेडे के Electro Magnetic Induction के तत्व के अनुसार स्थिर रखी कॉइल में EMF निर्माण होता है।

ट्रांसफार्मर की साधारण संरचना | Simple Structure Of Transformer-In Hindi

ट्रांसफार्मर की रचना में मुख्यतः कोर (Core) और वाइंडिंग (Winding) (Winding) यह दो मुख्य भाग होते हैं।

ट्रांसफार्मर कोअर (Transformer Core)

कोअर यह अंग्रेजी के L टाइप, E टाईप, I टाईप अथवा अयताकृति आकर के स्टेपिंग्स से बना होता है। यह स्टेपिंग्स सिलिकॉन स्टील के 0.35 mm से 0.5 mm जितनी मोटी बनी होती हैं।

इस तरह की अनेकों स्टेपिंग्स आपस मे एकदूसरे से उनसुलेटेड करके लैमिनेटेड कोअर बनाया जाता है। कोर (Core) बनाने के लिए सिलिकॉन स्टील का उपयोग किया जाता है। क्योंकि इससे हिस्टेरिसेस लॉस कम होता है। और कोई लामीनेटेड बनाने से एडी करंट लॉस कम होता है।

ट्रांसफार्मर वाइंडिंग (Transformer Winding)

ट्रांसफार्मर वाइंडिंग

ऊपर बताये गए  ट्रांसफार्मर कोअर (Transformer Core) पर कोर (Core) से इन्सुलेटेड करके प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग (Winding) की जाती है। जिस वाइंडिंग (Winding) को सप्लाय दिया जाता है उसे प्राइमरी वाइंडिंग (Winding) कहा जाता है।

जिस वाइंडिंग (Winding) से लोड के लिए सप्लाई लिया जाता है उसे सेकेंडरी वाइंडिंग (Winding) कहा जाता है। जिस तरह इंडिंग्स कोर (Core) से इंसुलेटेड की जाती है। उसी तरह प्राइमरी वाइंडिंग (Winding) और सेकेंडरी वाइंडिंग (Winding) भी आपस मे इंसुलेटेड की जाती है।

ट्रांसफार्मर की कार्यपद्धति | ट्रांसफार्मर कैसे काम करता है?

Working of Transformer | How Does The Transformer Work?- In Hindi

जब ट्रांसफार्मर की प्राइमरी वाइंडिंग (Winding) को AC Supply दिया जाता है। तब प्राइमरी वाइंडिंग (Winding) के चारो ओर बदलती चुंबकीय रेखाएं निर्माण होती हैं। चुम्बकीय रेखाएं बदलती होने के कारण स्थिर कंडक्टर से कट जाती हैं।

और प्रायमरी वाइंडिंग (Winding) में सेल्फ इंड्यूजड EMF निर्माण होता है। प्राइमरी वाइंडिंग (Winding) से AC Current का बहाव होता है, इस वजह से प्राइमरी वाइंडिंग (Winding) के चारो ओर बदलते फ्लक्स निर्माण होते हैं।

प्राइमरी फ्लक्स कोर (Core) के माध्यम से बहकर सेकेंडरी वाइंडिंग (Winding) तक पहुंचते हैं। फ्लक्स और सेकेंडरी वाइंडिंग (Winding) के टर्न्स के बीच कटिंग एक्शन होकर सेकेंडरी वाइंडिंग (Winding) में Mutual Induced EMF निर्माण होता है।

फेरेड के इलेक्ट्रो मैग्नेटिक इंडक्शन के दूसरे नियम के अनुसार निर्माण होने वाला induced EMF वाइंडिंग (Winding) के टर्न्स के सम अनुपात में होता है। मतलब वाइंडिंग (Winding) में जितने टर्न्स ज्यादा होंगे उतनीही कटिंग एक्शन ज्यादा होकर स्टेटिक EMF निर्माण होता है।

जब सेकेंडरी वाइंडिंग (Winding) को लोड से जोड़ा जाता है, तब सेकेंडरी का सर्किट पूरा होकर वाइंडिंग (Winding) से करंट फ्लो होने लगता है। और इस तरह लोड को इलेक्ट्रिक पावर प्रदान की जाती है। इस प्रकार ट्रांसफार्मर काम करता है। 

ट्रांसफार्मर के प्रकार

रचना के आधार पर ट्रांसफार्मर के प्रकार

ट्रांसफार्मर के कोर की रचना के आधार पर ट्रांसफार्मर के 3 प्रकार होते हैं

  1. कोर टाईप ट्रांसफार्मर
  2. शेल टाईप ट्रांसफार्मर
  3. बेरी टाईप ट्रांसफार्मर

कोर टाईप ट्रांसफार्मर

कोर (Core) टाइप ट्रांसफार्मर

जैसा कि आकृति में दिखाया गया है, की कोर टाईप ट्रांसफार्मर के कोर की स्टेपिंग्स L टाइप होती है। सब स्टेपिंग्स एक दूसरे से लैमिनेटेड होती है। कोर पर जहां प्राइमरी और सेकंडरी वाइंडिंग की जाती है। वहां दोनों वाइंडिंग भी आपस मे एक दूसरे से इंसुलेटेड होती है। साथी ही कोर से भी इंसुलेटेड होती है। इस कोर पर इंडिंग्स एक के बाद एक इस तरह से की जाती है। आपको आसानी से समझ आये इसलये आकृति में वाइंडिंग एक दूसरे से अलग दिखाई गई है। लेकिन वास्तव में दोनों इंडिंग्स एक दूसरे के ऊपर होती हैं।

इस तरह के कोर में फ्लक्स को बहने के लिए सिर्फ एक ही मार्ग होता है। इस वजह से इसमें लीकेज फ्लक्स का प्रमाण बहुत कम होता है। इस प्रकार के कोर की औसतन लंबाई ज्यादा होती है, लेकिन इसके आड़े काट छेद का क्षेत्रफल कम होता है। इसलिए ज्यादा टर्न्स इस कोर पर करने पड़ते हैं। इस ट्रांसफार्मर का उपयोग High Output Voltage के लिए किया जाता है।

शेल टाइप ट्रांसफार्मर

शेल टाइप ट्रांसफार्मर (Shell Type Transformer)

जैसा कि आकृति में दिखाया गया है, की शेल टाईप ट्रांसफार्मर के कोर की स्टेपिंग्स E टाइप और I टाइप होती है। सब स्टेपिंग्स एक दूसरे से लैमिनेटेड होती है। कोर के बीच जहां प्राइमरी और सेकंडरी वाइंडिंग की जाती है। वहां दोनों वाइंडिंग भी आपस मे एक दूसरे से इंसुलेटेड होती है। और यह दोनों इंडिंग्स प्राइमरी और सेकंडरी एक के बाद एक दूसरे के ऊपर की जाती है।

कोर पर वाइंडिंग करते समय पहले प्राइमरी इंडिमग फिर उसके बाद प्राइमरी वाइंडिंग पर सेकंडरी वाइंडिंग की जाती है। ऐसा करने से लीकेज फ्लक्स का प्रमाण कम हो जाता है। इस ट्रांसफार्मर के कोर में फ्लक्स को बहने के लिए 2 मार्ग होते हैं। वाइंडिंग बीच के लिंब पर स्थित होने के कारण इसमें लीकेज फ्लक्स का प्रमाण ज्यादा होता है। शेल टाइप ट्रांसफार्मर के कोर की औसतन लंबाई कम होती है, लेकिन आड़े काट छेद का क्षेत्रफल ज्यादा होता, इसलिए कम टर्न्स इस कोर पर करने पड़ते हैं।

इस ट्रांसफ़ॉर्मर का उपयोग Low Output Voltage के लिए किया जाता है। ज्यादातर सिंगल फेज ट्रांसफार्मर में शेल टाइप ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है।

बेरी टाइप ट्रांसफार्मर

बेरी टाइप ट्रांसफार्मर (Berry Type Transformer)

इसे डिस्ट्रिब्यूटेड कोर टाइप ट्रांसफार्मर भी कहा जाता है। जैसा कि आकृति में दिखाया गया है। बेरी टाइप ट्रांसफार्मर का कोर अयताकृति डिस्क से बना होता है। हर डिस्क की एक एक side का एक समूह बनाकर उस समूह पर वाइंडिंग की जाती है।

बेरी टाइप ट्रांसफार्मर में जितने स्टेपिंग्स होते हैं, उतने ही मार्ग फ्लक्स के बहाने के लिए होते हैं।

बेरी टाइप ट्रांसफार्मर में समस्याएं
  • बेरी टाइप ट्रांसफार्मर की रचना थोड़ी उलझन भरी होती है।
  • इसका मेंटेनेंस करना भी थोड़ा कठिन होता है।
  • वाइंडिंग करना कठिन होता है।
  • लीकेज क्रांतबक प्रमाण ज्यादा होता है।

इसी वजह से बेरी टाइप ट्रांसफार्मर ज्यादा चलन में नही हैं।

कोर टाइप ट्रानफॉर्मेर और शेल टाइप ट्रांसफ़ॉर्मर में क्या फर्क होता है?

कोर टाइप ट्रांसफार्मर

शेल टाइप ट्रांसफार्मर

  1. फ्लक्स बहने का एक ही मार्ग होता है।
  2. कोर के दिनों लिंब पर वाइंडिंग होती है।
  3. वाइंडिंग बाहर की तरफ होने की वजह से बाहरी हवा से वाइंडिंग ठंडी रखने में मदत होती है।
  4. कोर की औसतन लंबाई ज्यादा होती है।
  5. कोर के आड़े काट छेद का क्षेत्रफल कम होता है।
  6. लीकेज फ्लक्स का प्रमाण कम होता है।
  7. वाइंडिंग बाहरी लिंब पर होने के कारण आसानी से दिखाई देती है, और मेंटेनन्स के लिये आसान होती है।
  8. हाय वोल्टेज के लिए यह उपयुक्त होता है।
  1. फ्लक्स बहने के लिए दो मार्ग होते हैं।
  2. बीच के लिंब पर वाइंडिंग होती है।
  3. वाइंडिंग बीच के लिंब पर होने की वजह से कोर ठंडा होता है।
  4. कोर की औसतन लंबाई कम होती है।
  5. कोर के आड़े काट छेद का क्षेत्रफल ज्यादा होता है। इसलिए कम टर्न्स लगते हैं।
  6. लीकेज फ्लक्स का प्रमाण ज्यादा होता है।
  7. दुरुस्ती के लिए कठिन होता है। और वाइंडिंग करने में आसान होता है।
  8. लो वोल्टेज के लिए उपयुक्त होता है।

वोल्टेज के अनुसार ट्रांसफर्मर के कितने प्रकार होते हैं?

वोल्टेज को कम या ज्यादा करने के हिसाब से ट्रांसफार्मर के 2 प्रकार हैं।

  1. स्टेप अप ट्रांसफार्मर
  2. स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर

स्टेप अप ट्रांसफार्मर (Step Up Transformer)

स्टेप अप ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग

जो ट्रांसफार्मर अपनी प्राइमरी वाइंडिंग को दिए हुए वोल्टेज को ज्यादा वोल्टेज में परिवर्तित करके आउटपुट वोल्टेज देता है, उस ट्रांसफार्मर को स्टेप उप ट्रांसफार्मर (Step Up Transformer) कहते हैं।

इसकी रचना कोर टाइप अथवा शेल टाइप होती है। स्टेप अप ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग टर्न्स प्राइमरी से ज्यादा सेकंडरी में होते हैं। इस वजह से प्राइमरी के फ्लक्स सेकंडरी के ज्यादा टर्न्स से कट जाती हैं। सेकंडरी वाइंडिंग में म्यूचअल इंडक्शन की क्रिया होकर ज्यादा वोल्टेज निर्माण होता है। सेकंडरी का वोल्टेज ज्यादा होने की वजह से सेकंडरी का करंट कम होता है।

इसलिए प्राइमरी वाइंडिंग कम टर्न्स और ज्यादा मोटे तार की होती है। और सेकंडरी वाइंडिंग ज्यादा टर्न्स की और कम मोटे तार की होती है।

जिस जगह वोल्टेज बढ़ाना पड़ता है, उस जगह स्टेप अप ट्रांसफार्मर (Step Up Transformer) का उपयोग होता है।

स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर ( Step Down Transformer)

स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग

जो Transformer अपनी प्राइमरी वाइंडिंग को दिए हुए वोल्टेज को कम वोल्टेज में परिवर्तित करके आउटपुट वोल्टेज देता है, उस ट्रांसफार्मर को स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर (Step Down Transformer) कहते हैं। इस ट्रांसफार्मर की रचना भी कोर टाइप अथवा शेल टाइप होती है। स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर की प्राइमरी कम मोटे तार की और ज्यादा टर्न्स की होती है। सेकंडरी कम टर्न्स और मोटे तार से बनी होती है। 

इस ट्रांसफार्मर का उपयोग वोल्टेज को कम करने के लिए किया जाता है।

इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफार्मर (Instrument Transformer)

इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफर्मर यह एक प्रकार का स्टेप अप ट्रांसफार्मर या स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर ही होता है। लेकिन इसके सेकंडरी वाइंडिंग को एक कम रेंज के वोल्टमीटर या अमीटर कनेक्ट होता है। इसका उपयोग HT Line का करंट और वोल्टेज मेजर करने के लिए किया जाता है। HT Line का करंट मेजर करने के लिए Current Transformer (CT) और वोल्टेज मेजर करने के लिए पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (PT) का उपयोग किया जाता है।

करंट ट्रांसफार्मर (Current Transformer- CT) 

इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफार्मर (Instrument Transformer) Images

यह एक स्टेप अप ट्रांसफ़ॉर्मर होता है। जैसा कि आकृति में दिखायवगे है। करंट ट्रांसफार्मर की प्राइमरी वाइंडिंग मोटे तार की और कम टर्न्स की ( एक या दो टर्न्स कई जगहों पर सिर्फ एक टर्न की) होती है। करंट ट्रांसफार्मर की प्राइमरी वाइंडिंग HT Line के सीरीज में जोड़ी जाती है। सेकंडरी वाइंडिंग बारीक तार की होती है। और ज्यादा टर्न्स की होती है। सेकंडरी वाइंडिंग के छोर पर एक लौ रेंज के अमीटर जुड़ा होता है, जिसकी एक साइड अर्थ की जाती है। अमीटर कम रेंज के हित है, लेकिन इसकी स्केल ट्रांसफार्मर के रेशियो के हिसाब से विभाजित होती है।

करंट ट्रान्सफॉर्मर की कार्यपद्धती

Current Transformer की प्रायमरी HT Line के सीरीज में होने के कारण पूरा करंट प्राइमरी वाइंडिंग में से फ्लो होता है। इस वजह से प्राइमरी के चारो ओर फ्लक्स निर्माण होते हैं। प्राइमरी में निर्माण हुई फ्लक्स यह सेकंडरी इंडिन्स की टर्न्स से कट जाती है। सेकंडरी के टर्न्स ज्यादा होने के कारण सेकंडरी में उच्च वोल्टेज निर्माण होता है। लेकिन सेकंडरी का करंट यह Transformer के रेशियो के प्रमाण से कम ही होता है। यह कम करंट अमीटर में से फ्लो होता है। अमीटर में बहने वाला करंट वास्तव में कम होता है लेकिन अमीटर की स्केल यह ट्रानफॉर्मर के रेशियो के हिसाब से विभाजित होती है। जिस वजह से अमीटर पर HT Line में से बहने वाले वास्तविक करंट की रीडिंग हमे मिलती है। इस तरह HT Line का High Current Low Range के अमीटर से मेजर करना आसान होता है। जो बिना करंट ट्रांसफार्मर के असंभव है। क्यों कि उच्च करंट पर अगर कम रेंज का अमीटर उपयोग में लाया जाए तो वह जल जाएगा। इसलिए करंट ट्रांसफार्मर से पहले HT Line का करंट कम किया जाता है। और फिर उसे कम रेंज के अमीटर से मेजर किया जाता है।

करंट ट्रांसफार्मर की सेकंडरी साइड अर्थ क्यों कि जाती है?

Current Transformer की सेकंडरी वाइंडिंग अगर किसी कारणवश ओपन हो जाए, तो सेकंडरी से कुछ भी करंट फ्लो नही होता। इस वजह से सेकंडरी में फ्लक्स निर्माण नही होते। अब इस समय प्राइमरी फ्लक्स को विरोध करने वाले फ्लक्स न होने के कारण कोर में से ज्यादा से ज्यादा फ्लक्स फ्लो होने लगते हैं। सेकंडरी में High Voltage निर्माण होता है। High Voltage के कारण कोर और वाइंडिंग के बीच का इंसुलेशन (Insulation) खराब होने लगता है। करंट ट्रान्सफॉर्मर का कोर बहुत गर्म हो जाता है। ज्यादा ऊष्मा के कारण कोर का चुम्बकीय गुण हमेशा के लिए गायब (समाप्त) हो जात है। और कई बार तो कुछ समय बाद करंट ट्रांसफार्मर ब्लास्ट होने की भी संभावना बन जाती है। ऐसा ना हो इस वजह से करंट ट्रान्सफॉर्मर की सेकंडरी वाइंडिंग कभी भी ओपन नही रखी जाती। सेकंडरी साइड में एक लो रेंज के अमीटर जोड़कर सेकंडरी  वाइंडिंग का सर्किट हमेशा क्लोज रखा जाता है। उसकी एक साइड अर्थ कर दी जाती है।
अचानक अमीटर में कुछ खराबी होने के कारण या  और किसी कारण से सेकंडरी वाइंडिंग ओपन होने की संभावना हमेशा रहती है। ऐसा होने के कारण ऊपर बताया गया धोका करंट ट्रांसफार्मर को होता है। इसलिए सेकंडरी में अमीटर जोड़ने के बावजूद उसकी एक साइड हमेशा अर्थ की जाती है। जब कभी भी अमीटर सर्किट से निकाला जाता है, तब सेकंडरी साइड शार्ट की जाती है। ताकि सर्किट हमेशा क्लोज रहे।

पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (Potential Transformer- PT)

पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (Potential Transformer) यह स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर होता है। सेकंडरी वाइंडिंग के टर्न्स मोटे तार के और कम टर्न्स के होते हैं। यह Shell Type Transformer होता है। जैसा कि आकृति में दिखाया गया है,  PT की प्राइमरी वाइंडिंग बारीक तार की और ज्यादा टर्न्स की होती है। पोटेंशियल ट्रांसफार्मर की प्राइमरी वाइंडिंग HT Line के पैरलल जोडब्जाति है। सेकंडरी वाइंडिंग के छोर पर एक लो रेंज के वोल्टमीटर जुड़ा होता है। (साधारणतः सेकंदसरी का वोल्टेज 110 V तक स्टेप डाउन किया होता है।) 

पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (Potential Transformer- PT) की कार्यपद्धति | पोटेंशियल ट्रांसफार्मर PT कैसे काम करता है?

Potential Transformer PT की प्रायमरी वाइंडिंग  HT Line के पैरलल जुड़ी होती है। प्राइमरी के फ्लक्स सेकेंडरी वाइंडिंगस के टर्न्स से कट जाते हैं। सेकंडरी के टर्न्स कम हिने के कारण सेकंडरी में कम वोल्टेज निर्माण होता है। यही कम वोल्टेज सेकंडरी से जुड़े वोल्टमीटर को मिलता है। वास्तव में वोल्टमीटर को कम वोल्टेज मिलता है। लेकिन उस वोल्टेज की स्केल ट्रांसफार्मर के रेशियो के हिसाब से विभाजित होती है। इसलिए वाल्टमीटर पर मिलने वाली रीडिंग यह HT Line के उस समय के वास्तविक वोल्टेज के बराबर दिखाई देती है। इस तरह HT Line का High Voltage लो रेंज के वोल्टमीटर से आसानी से मेजर किया जाता है।

पावर ट्रांसफार्मर के 10 मुख्य भाग कोन कोन से होते हैं ?

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