ट्रांसफार्मर कितने प्रकार के होते हैं? | The Types Of Transformers- In Hindi

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रचना के आधार पर ट्रांसफार्मर के प्रकार

कोर (Core) की रचना के आधार पर ट्रांसफार्मर के प्रकार 3 होते हैं

  1. कोर (Core) टाइप ट्रांसफार्मर
  2. शेल टाइप ट्रांसफार्मर
  3. बेरी टाइप ट्रांसफार्मर

अगर आपको जानना है की,

ट्रांसफार्मर क्या है | ट्रांसफार्मर की परिभाषा | ट्रांसफार्मर किस सिद्धांत पर कार्य करता है? तो यह पढिए…

कोर (Core) टाइप ट्रांसफार्मर (Core Type Transformer)

कोर (Core) टाइप ट्रांसफार्मर

जैसा कि आकृति में दिखाया गया है, की कोर (Core) टाइप ट्रांसफार्मर के कोर (Core) की स्टैम्पिंगस (Stampings) L टाइप होती है। सब स्टैम्पिंगस (Stampings) एक दूसरे से लैमिनेटेड होती है।

कोर (Core) पर जहां प्राइमरी और सेकंडरी वाइंडिंग की जाती है। वहां दोनों वाइंडिंग भी आपस मे एक दूसरे से इंसुलेटेड होती है। साथी ही कोर (Core) से भी इंसुलेटेड होती है।

इस कोर (Core) पर इंडिंग्स एक के बाद एक इस तरह से की जाती है। आपको आसानी से समझ आये इसलये आकृति में वाइंडिंग एक दूसरे से अलग दिखाई गई है। लेकिन वास्तव में दोनों इंडिंग्स एक दूसरे के ऊपर होती हैं।

इस तरह के कोर (Core) में फ्लक्स को बहने के लिए सिर्फ एक ही मार्ग होता है। इस वजह से इसमें लीकेज फ्लक्स का प्रमाण बहुत कम होता है। इस प्रकार के कोर (Core) की औसतन लंबाई ज्यादा होती है, लेकिन इसके आड़े काट छेद का क्षेत्रफल कम होता है।

इसलिए ज्यादा टर्न्स इस कोर (Core) पर करने पड़ते हैं। इस ट्रांसफार्मर का उपयोग High Output Voltage के लिए किया जाता है।

शेल टाइप ट्रांसफार्मर (Shell Type Transformer)

शेल टाइप ट्रांसफार्मर (Shell Type Transformer)

जैसा कि आकृति में दिखाया गया है, की शेल टाइप ट्रांसफार्मर के कोर (Core) की स्टैम्पिंगस (Stampings) E टाइप और I टाइप होती है। सब स्टैम्पिंगस (Stampings) एक दूसरे से लैमिनेटेड होती है।

कोर (Core) के बीच जहां प्राइमरी और सेकंडरी वाइंडिंग की जाती है। वहां दोनों वाइंडिंग भी आपस मे एक दूसरे से इंसुलेटेड होती है। और यह दोनों इंडिंग्स प्राइमरी और सेकंडरी एक के बाद एक दूसरे के ऊपर की जाती है।

कोर (Core) पर वाइंडिंग करते समय पहले प्राइमरी इंडिमग फिर उसके बाद प्राइमरी वाइंडिंग पर सेकंडरी वाइंडिंग की जाती है। ऐसा करने से लीकेज फ्लक्स का प्रमाण कम हो जाता है।

इस ट्रांसफार्मर के कोर (Core) में फ्लक्स को बहने के लिए 2 मार्ग होते हैं। वाइंडिंग बीच के लिंब पर स्थित होने के कारण इसमें लीकेज फ्लक्स का प्रमाण ज्यादा होता है। शेल टाइप ट्रांसफार्मर के कोर (Core) की औसतन लंबाई कम होती है, लेकिन आड़े काट छेद का क्षेत्रफल ज्यादा होता, इसलिए कम टर्न्स इस कोर (Core) पर करने पड़ते हैं।

इस ट्रांसफ़ॉर्मर का उपयोग Low Output Voltage के लिए किया जाता है। ज्यादातर सिंगल फेज ट्रांसफार्मर में शेल टाइप ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है।

बेरी टाइप ट्रांसफार्मर (Berry Type Transformer)

बेरी टाइप ट्रांसफार्मर (Berry Type Transformer)

इसे डिस्ट्रिब्यूटेड कोर (Core) टाइप ट्रांसफार्मर भी कहा जाता है। जैसा कि आकृति में दिखाया गया है। बेरी टाइप ट्रांसफार्मर का कोर (Core) अयताकृति डिस्क से बना होता है। हर डिस्क की एक side मिलाकर एक समूह बनाया जाता है  और  उस समूह पर वाइंडिंग की जाती है।

बेरी टाइप ट्रांसफार्मर में जितने स्टैम्पिंगस (Stampings) होते हैं, उतने ही मार्ग फ्लक्स के बहाने के लिए होते हैं।

बेरी टाइप ट्रांसफार्मर (Berry Type Transformer) में समस्याएं

  1. बेरी टाइप ट्रांसफार्मर की रचना थोड़ी उलझन भरी होती है।
  2. इसका मेंटेनेंस करना भी थोड़ा कठिन होता है।
  3. वाइंडिंग करना कठिन होता है।
  4. लीकेज क्रांतबक प्रमाण ज्यादा होता है।

इसी वजह से बेरी टाइप ट्रांसफार्मर ज्यादा चलन में नही हैं।

कोर (Core) टाइप ट्रांसफार्मर और शेल (Shell) टाइप ट्रांसफ़ॉर्मर में क्या फर्क होता है?

Difference Between Core Type Transformer and Shell Type Transformer- IN HINDI

कोर (Core) टाइप ट्रांसफार्मर

शेल (Shell) टाइप ट्रांसफार्मर

  1. फ्लक्स बहने का एक ही मार्ग होता है।
  2. कोर (Core) के दिनों लिंब पर वाइंडिंग होती है।
  3. वाइंडिंग बाहर की तरफ होने की वजह से बाहरी हवा से वाइंडिंग ठंडी रखने में मदत होती है।
  4. कोर (Core) की औसतन लंबाई ज्यादा होती है।
  5. कोर (Core) के आड़े काट छेद का क्षेत्रफल कम होता है।
  6. लीकेज फ्लक्स का प्रमाण कम होता है।
  7. वाइंडिंग बाहरी लिंब पर होने के कारण आसानी से दिखाई देती है, और मेंटेनन्स के लिये आसान होती है।
  8. हाय वोल्टेज के लिए यह उपयुक्त होता है।
  1. फ्लक्स बहने के लिए दो मार्ग होते हैं।
  2. बीच के लिंब पर वाइंडिंग होती है।
  3. वाइंडिंग बीच के लिंब पर होने की वजह से कोर (Core) ठंडा होता है।
  4. कोर (Core) की औसतन लंबाई कम होती है।
  5. कोर (Core) के आड़े काट छेद का क्षेत्रफल ज्यादा होता है। इसलिए कम टर्न्स लगते हैं।
  6. लीकेज फ्लक्स का प्रमाण ज्यादा होता है।
  7. दुरुस्ती के लिए कठिन होता है। और वाइंडिंग करने में आसान होता है।
  8. लो वोल्टेज के लिए उपयुक्त होता है।

वोल्टेज के अनुसार ट्रांसफर्मर के कितने प्रकार होते हैं?

वोल्टेज को कम या ज्यादा करने के हिसाब से ट्रांसफार्मर के 2 प्रकार हैं।
1. स्टेप अप ट्रांसफार्मर (Step Up Transformer)
2. स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर (Step Down Transformer)

स्टेप अप ट्रांसफार्मर (Step Up Transformer)

जो ट्रांसफार्मर अपनी प्राइमरी वाइंडिंग को दिए हुए वोल्टेज को ज्यादा वोल्टेज में परिवर्तित करके आउटपुट वोल्टेज देता है, उस ट्रांसफार्मर को स्टेप अप ट्रांसफार्मर (Step Up Transformer) कहते हैं।

स्टेप अप ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग

स्टेप अप ट्रांसफार्मर की रचना|Composition Of Step sub transformer- In Hindi

इसकी रचना कोर (Core) टाइप अथवा शेल टाइप होती है। स्टेप अप ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग टर्न्स प्राइमरी से ज्यादा सेकंडरी में होते हैं। इस वजह से प्राइमरी के फ्लक्स सेकंडरी के ज्यादा टर्न्स से कट जाते हैं।

सेकंडरी वाइंडिंग में म्यूचअल इंडक्शन की क्रिया होकर ज्यादा वोल्टेज निर्माण होता है। सेकंडरी का वोल्टेज ज्यादा होने की वजह से सेकंडरी का करंट कम होता है। इसलिए प्राइमरी वाइंडिंग कम टर्न्स और ज्यादा मोटे तार की होती है।

और सेकंडरी वाइंडिंग ज्यादा टर्न्स की और कम मोटे तार की होती है। जिस जगह वोल्टेज बढ़ाना पड़ता है, उस जगह स्टेप अप ट्रांसफार्मर (Step Up Transformer) का उपयोग होता है।

स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर ( Step Down Transformer)

जो ट्रांसफार्मर अपनी प्राइमरी वाइंडिंग को दिए हुए वोल्टेज को कम वोल्टेज में परिवर्तित करके आउटपुट वोल्टेज देता है, उस ट्रांसफार्मर को स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर (Step Down Transformer) कहते हैं।

स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग

इस ट्रांसफार्मर की रचना भी कोर (Core) टाइप अथवा शेल टाइप होती है। स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर की प्राइमरी कम मोटे तार की और ज्यादा टर्न्स की होती है। सेकंडरी कम टर्न्स और मोटे तार से बनी होती है।   इस ट्रांसफार्मर का उपयोग वोल्टेज को कम करने के लिए किया जाता है।

इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफार्मर (Instrument Transformer)

What Is Instrument Transformer In Hindi

इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफार्मर (Instrument Transformer) Images

इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफार्मर यह एक प्रकार का स्टेप अप ट्रांसफार्मर या स्टेप डाउन ट्रांसफार्मर ही होता है। लेकिन इसके सेकंडरी वाइंडिंग को एक कम रेंज के वोल्टमीटर या अमीटर कनेक्ट होता है। इसका उपयोग HT Line का करंट और वोल्टेज मेजर करने के लिए किया जाता है। HT Line का करंट मेजर करने के लिए Current Transformer (CT) और वोल्टेज मेजर करने के लिए पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (PT) का उपयोग किया जाता है।

करंट ट्रांसफार्मर क्या है ? (Current Transformer- CT)-In Hindi

What is current transformer?- In Hindi
यह एक स्टेप अप ट्रांसफार्मर होता है। जैसा कि आकृति में दिखाया गया  है। करंट Transformer की प्राइमरी वाइंडिंग मोटे तार की और कम टर्न्स की ( एक या दो टर्न्स कई जगहों पर सिर्फ एक टर्न की) होती है। करंट ट्रांसफार्मर की प्राइमरी वाइंडिंग HT Line के सीरीज में जोड़ी जाती है। सेकंडरी वाइंडिंग बारीक तार की होती है। और ज्यादा टर्न्स की होती है। सेकंडरी वाइंडिंग के छोर पर एक लौ रेंज के अमीटर जुड़ा होता है, जिसकी एक साइड अर्थ की जाती है। अमीटर कम रेंज के हित है, लेकिन इसकी स्केल ट्रांसफार्मर के रेशियो के हिसाब से विभाजित होती है।

करंट ट्रांसफार्मर कैसे काम करता है?

Working of Current Transformer | How Does a Current Transformer Work?- In  Hindi
करंट Transformer की प्रायमरी वाइंडिंग HT Line के सीरीज में होने के कारण पूरा करंट प्राइमरी वाइंडिंग में से फ्लो होता है। इस वजह से प्राइमरी के चारो ओर फ्लक्स निर्माण होते हैं। प्राइमरी में निर्माण हुई फ्लक्स यह सेकंडरी इंडिन्स की टर्न्स से कट जाती है। सेकंडरी के टर्न्स ज्यादा होने के कारण सेकंडरी में उच्च वोल्टेज निर्माण होता है। लेकिन सेकंडरी का करंट यह ट्रांसफार्मर के रेश्यो के प्रमाण से कम ही होता है। यह कम करंट अमीटर में से फ्लो होता है। अमीटर में बहने वाला करंट वास्तव में कम होता है लेकिन अमीटर की स्केल यह करंट ट्रांसफार्मर रेश्यो के हिसाब से विभाजित होती है। जिस वजह से अमीटर पर HT Line में से बहने वाले वास्तविक करंट की रीडिंग हमे मिलती है। इस तरह HT Line का High Current Low Range के अमीटर से मेजर करना आसान होता है। जो बिना करंट ट्रांसफार्मर के असंभव है। क्यों कि उच्च करंट पर अगर कम रेंज का अमीटर उपयोग में लाया जाए तो वह जल जाएगा। इसलिए करंट ट्रांसफार्मर से पहले HT Line का करंट कम किया जाता है। और फिर उसे कम रेंज के अमीटर से मेजर किया जाता है।

करंट ट्रांसफार्मर की  सेकंडरी साइड को कभी भी खुला नहीं छोड़ा जाता ?

Why Secondary Side of Current Transformer is Never Left Open?
करंट Transformer की सेकंडरी वाइंडिंग अगर किसी कारणवश ओपन हो जाए, तो सेकंडरी से करंट फ्लो नही होता। इस वजह से सेकंडरी में फ्लक्स निर्माण नही होते। अब इस समय प्राइमरी फ्लक्स को विरोध करने वाले फ्लक्स न होने के कारण कोर में से ज्यादा से ज्यादा फ्लक्स फ्लो होने लगते हैं। सेकंडरी में High Voltage निर्माण होता है। High Voltage के कारण कोर और वाइंडिंग के बीच का इंसुलेशन (Insulation) खराब होने लगता है। Current Transformer का कोर बहुत गर्म हो जाता है। ज्यादा ऊष्मा के कारण कोर का चुम्बकीय गुण हमेशा के लिए समाप्त हो जात है। और कई बार तो कुछ समय बाद करंट ट्रांसफार्मर ब्लास्ट होने की भी संभावना बन जाती है। ऐसा ना हो इस वजह से करंट ट्रांसफार्मर की  सेकंडरी साइड को कभी भी खुला नहीं छोड़ा जाता । सेकंडरी साइड में एक लो रेंज के अमीटर जोड़कर सेकंडरी  वाइंडिंग का सर्किट हमेशा क्लोज रखा जाता है। उसकी एक साइड अर्थ कर दी जाती है।

करंट ट्रांसफार्मर की सेकंडरी साइड को Earth क्यों किया जाता है?

Why is the secondary side of current transformer earthed? -In  Hindi
अचानक अमीटर में कुछ खराबी होने के कारण या और किसी कारण से सेकंडरी वाइंडिंग ओपन होने की संभावना हमेशा बनी रहती है। ऐसा होने के कारण ऊपर बताया गया धोका Current Transformer के लिए हो सकता  है। इसलिए सेकंडरी में अमीटर जोड़ने के बावजूद करंट ट्रांसफार्मर की सेकंडरी साइड को Earth किया जाता है। जब कभी भी अमीटर सर्किट से निकाला जाता है, तब सेकंडरी साइड शार्ट की जाती है। ताकि सर्किट हमेशा क्लोज रहे। ताकि करंट ट्रांसफार्मर संभावित धोके से बच सके 

पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (Potential Transformer- PT)

पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (Potential Transformer) यह स्टेप डाउन Transformer  होता है। सेकंडरी वाइंडिंग के टर्न्स मोटे तार के और कम टर्न्स के होते हैं। यह Shell Type Transformer होता है। जैसा कि आकृति में दिखाया गया है,  PT की प्राइमरी वाइंडिंग बारीक तार की और ज्यादा टर्न्स की होती है। पोटेंशियल ट्रांसफार्मर की प्राइमरी वाइंडिंग HT Line के पैरलल जोडब्जाति है। सेकंडरी वाइंडिंग के छोर पर एक लो रेंज के वोल्टमीटर जुड़ा होता है। (साधारणतः सेकंदसरी का वोल्टेज 110 V तक स्टेप डाउन किया होता है।) 

पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (Potential Transformer- PT) की कार्यपद्धति | पोटेंशियल ट्रांसफार्मर कैसे काम करता है?

पोटेंशियल ट्रांसफार्मर की प्रायमरी वाइंडिंग  HT Line के पैरलल जुड़ी होती है। प्राइमरी के फ्लक्स सेकेंडरी वाइंडिंगस के टर्न्स से कट जाते हैं। सेकंडरी के टर्न्स कम हिने के कारण सेकंडरी में कम वोल्टेज निर्माण होता है। यही कम वोल्टेज सेकंडरी से जुड़े वोल्टमीटर को मिलता है। वास्तव में वोल्टमीटर को कम वोल्टेज मिलता है। लेकिन उस वोल्टेज की स्केल पोटेंशियल ट्रांसफार्मर रेश्यो के हिसाब से विभाजित होती है। इसलिए वाल्टमीटर पर मिलने वाली रीडिंग यह HT Line के उस समय के वास्तविक वोल्टेज के बराबर दिखाई देती है। इस तरह HT Line का High Voltage लो रेंज के वोल्टमीटर से आसानी से मेजर किया जाता है

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